नौसेना की भूमिका

देश की नौसेना के काम का दायरा बहुत बड़ा हो सकता है जिसमें एक ओर उच्च तीव्रता वाले युद्ध से लेकर दूसरी ओर मानवीय सहायता और आपदा राहत से जुड़े कार्य शामिल हो सकते हैं। इन लगातार चलने वाले ऑपरेशन को अलग-अलग भूमिकाओं में विभाजित किया जा सकता है, और प्रत्येक को पूरा करने के लिए अलग पद्धति को अपनाना पड़ता है।

उसी प्रकार से, भारतीय नौसेना के लिए चार मुख्य भूमिकाओं का उल्लेख किया गया है जो इस प्रकार से हैं:-

The Military Role

सैन्य भूमिका

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सभी नौसेनाओं का सार उनका सैन्य चरित्र होता है। वास्तव में, नौसेनाओं का उद्देश्य सुनिश्चित करना होता है कि कोई भी दुश्मन नौसेना राष्ट्रीय सुरक्षा व हितों को नुकसान न पहुंचाने पाए। नौसेना की सैन्य भूमिका में समुद्र में और वहां से आने वाले खतरों पर बल प्रयोग करना होता है। इसमें दुश्मन के इलाके और व्यापार के विरुद्ध आक्रामक कार्यवाही करने और अपने बल, इलाके और व्यापार की रक्षा के लिए रक्षात्मक कार्यवाही करने में समुद्री ताकत का प्रयोग करना होता है। विशिष्ट सैन्य उद्देश्यों, मिशन और कार्य को पूरा करते हुए सैन्य भूमिका को पूरा किया जाता है।

  • युद्ध या मध्यस्थता के विरुद्ध प्रतिरोध
  • युद्ध की स्थिति में निर्णायक सैन्य विजय
  • समुद्र से उत्पन्न होने वाले खतरे से भारत की प्रादेशिक अखंडता, नागरिकों और अपतटीय परिसंपत्तियों की सुरक्षा
  • भूमि क्षेत्रों के मामलों में प्रभावी भूमिका निभाना
  • भारत के समुद्र से जुड़े वाणिज्य और समुद्री व्यापार की रक्षा
  • भारत के राष्ट्रीय हितों और समुद्री सुरक्षा की रक्षा
  • दूसरा परमाणु हमला
  • एमडीए
  • समुद्री नियंत्रण
  • दुश्मन को समुद्र का उपयोग करने से रोकना
  • अवरोध
  • शक्ति का प्रदर्शन
  • अभियान सम्बन्धी ऑपरेशन
  • दुश्मन से जबरदस्ती काम कराना
  • विनाश
  • एसएलओसी प्रतिबंध
  • एसएलओसी संरक्षण
  • विशेष ऑपरेशन
  • अपतटीय परिसंपत्तियों का संरक्षण
  • समुद्र की चारों ओर से रक्षा
  • एनसीएजीएस ऑपरेशन
  • निगरानी
  • समुद्री हमला
  • पनडुब्बी रोधी ऑपरेशन
  • सतह रोधी ऑपरेशन
  • हवा रोधी ऑपरेशन
  • जलस्थली ऑपरेशन
  • सूचना ऑपरेशन
  • इलेक्ट्रॉनिक युद्ध
  • विशेष ऑपरेशन
  • बारूदी सुरंग संबंधित युद्ध
  • वीबीएसएस
  • बंदरगाह की रक्षा
The Diplomatic Role

राजनयिक भूमिका

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नौसेना कूटनीति में एक ओर 'दोस्ती का निर्माण करने' और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से लेकर संभावित दुश्मनों को आगे नहीं बढ़ने देने के लिए क्षमता का संकेत देने से लेकर अपनी इच्छा दिखाने के लिए विदेश नीति के उद्देश्यों के समर्थन में नौसेना का उपयोग शामिल होता है। नौसेना की कूटनीतिक भूमिका का एक बड़ा उद्देश्य विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा के उद्देश्यों के अनुरूप राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने में समुद्री वातावरण को अनुकूल बनाना होता है। नौसेनाएं दो गुणों के चलते स्वाभाविक रूप से कूटनीतिक भूमिका निभाने में निपुण होती हैं। पहला गुण होता है देश की सर्वोच्च शक्ति के व्यापक साधन के रूप में उनका ओहदा, जहाँ किसी निश्चित क्षेत्र में या उससे थोड़ा दूर उनकी मौजूदगी भर ही उस क्षेत्र में राष्ट्र के हितों के अनुसरण में राष्ट्र के राजनैतिक इरादे और समर्पण का संकेत देती है। इसलिए, उनकी उपस्थिति या अनुपस्थिति का इस्तेमाल संभावित दोस्तों और दुश्मनों को एक साथ राजनैतिक संदेश भेजने के लिए किया जा सकता है। नौसेना की कूटनीतिक भूमिका में सहायता करने वाला दूसरा गुण समुद्री ताकत की उसकी विशेषता में मौजूद है, जिसमें पहुँच, गतिशीलता, समर्थन, विस्तार, लचीलापन और विविधता शामिल हैं। इनके उपयोग से राष्ट्रीय हितों और विदेश नीति के लक्ष्यों को पूरा किया जाता है। नौसेना को आसानी से तैनात किया जा सकता है, वे अनेक भूमिकाएं निभा और कार्य पूरा कर सकती है जिसे कि संख्या की आवश्यकता अनुसार तैनात किया जा सकता है, और काउंटर सिग्नल भेजने के लिए आसानी से और तेज़ी से हटाया जा सकता है।

  • राजनैतिक संबंधों और सद्भावना की मजबूती
  • मित्र राष्ट्रों के साथ रक्षा संबंधों की मजबूती
  • रक्षा व क्षमता का विश्वसनीय चित्रण
  • हिन्द महासागर के क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा की मजबूती
  • क्षेत्रीय व वैश्विक स्थिरता को बढ़ावा
  • रचनात्मक समुद्री सहभागिता
  • समुद्री सहायता व समर्थन
  • मौजूदगी
  • शांति कार्य
  • विदेशों में तैनाती
  • झंडा प्रदर्शन/बंदरगाह का दौरा
  • विदेशी युद्धपोतों की मेजबानी का आयोजन
  • तकनीकी व रसद सहायता
  • विदेशी प्रशिक्षण
  • समुद्री गश्त
  • द्विपक्षीय/ बहुपक्षीय अभ्यास
  • ओओएसी कार्य
  • गैर-लड़ाकू निकास ऑपरेशन
  • शांति लागू करना, शांति लाना, शांति कायम रखना और शांति का निर्माण
  • आईओएनएस कार्यक्रम के तहत गतिविधियां
Constabulary Role

रक्षीदल भूमिका

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समुद्री जुर्म की बढ़ती घटनाओं ने नौसेना की रक्षीदल की भूमिका को बढ़ा दिया है। इस भूमिका के महत्व को इस तथ्य से आंका जा सकता है कि दुनिया की एक तिहाई नौसेनाएं इस कार्य को मुख्य रूप से करती हैं। रक्षीदल की भूमिका में, सेनाओं को देश का कानून लागू करने या अंतर्राष्ट्रीय जनादेश द्वारा स्थापित शासन लागू करने के लिए तैनात किया जाता है। सेना की तैनाती आत्म-रक्षा करने या इस भूमिका के निष्पादन में अंतिम उपाय के रूप में किया जाता है। भारत की समुद्री सुरक्षा की रक्षा और संवर्धन भारतीय नौसेना की प्रमुख जिम्मेदारियों में से एक होता है। इसमें रक्षीदल की भूमिका शामिल होती है, खासकर जहाँ इसका संबंध खतरों से हो जब समुद्र में बल का उपयोग करने की ज़रुरत पड़ती है। रक्षीदल की भूमिका में भारतीय नौसेना को कम तीव्रता वाले समुद्री ऑपरेशन (एलआईएमओ) से लेकर समुद्र में अच्छी व्यवस्था कायम रखी होती है। भारत की समग्र समुद्री सुरक्षा के भाग के रूप में इसमें तटीय सुरक्षा के पहलु भी शामिल होते हैं। समुद्र में रक्षीदल सम्बन्धी कार्य न तो मुख्य होते हैं और न ही भारतीय नौसेना का एकमात्र जनादेश। फरवरी 1978 में आईसीजी की स्थापना के साथ, भारतीय समुद्री क्षेत्र (एमज़ेडआई) के भीतर रक्षीदल भूमिका के कानून लागू करने संबंधी पहलुओं को आईसीजी को स्थानांतरित कर दिया गया है। मुख्य बंदरगाहों व पोताश्रयों में सुरक्षा का जिम्मा पोताश्रय अधिकारियों के दायरे में आता है, जिसमें कस्टम व आवाजान एजेंसियां सहायता करती हैं। एमज़ेडआई से परे रक्षीदल कार्यों का जिम्मा भारतीय नौसेना के पास होता है। कुशल व प्रभावी समुद्री रक्षा के लिए विभिन्न समुद्री कानून प्रवर्तन व नियामक एजेंसियों के बीच उचित व निर्बाध समन्वय की आवश्यकता होती है। 26 नवंबर 2008 को मुंबई पर आतंकवादी हमलों के बाद, तटीय सुरक्षा की सम्पूर्ण जिम्मेदारी भारतीय नौसेना को सौंप दी गई है, जिसमें आईसीजी, राज्य की समुद्री पुलिस और अन्य केंद्रीय/राज्य की सरकारी व पोताश्रय अधिकारी निकट से सहयोग करेंगे।

  • तटीय रक्षा
  • ईईज़ेड की सुरक्षा
  • समुद्र में अच्छी व्यवस्था
  • आतंकवाद की रोकथाम
  • शासन व्यवस्था
  • घुसपैठ की रोकथाम
  • समुद्री डकैती की रोकथाम
  • अवैध शिकार की रोकथाम
  • अवैध-व्यापार की रोकथाम
Benign Role

सौम्य भूमिका

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इस 'मामूली' भूमिका को ऐसा नाम इसलिए दिया गया है क्योंकि इसके निष्पादन में हिंसा की कोई भूमिका नहीं होती है, और न ही इन कार्यों को करते समय बल का प्रयोग आवश्यक होता है। मामूली कार्यों के उदाहरणों में मानवीय सहायता, आपदा राहत, खोज व बचाव (एसएआर), आयुध निपटान, गोताखोरी सहायता, रक्षा कार्य, जल सर्वेक्षण, आदि शामिल हैं। अपनी त्वरित गतिशीलता के चलते, समुद्री बल राहत सामग्री, प्राथमिक चिकित्सा और सहायता प्रदान करने के लिए संकट के आरंभिक चरणों में बहुत उपयोगी होते हैं। इन कार्यों को पूरा करने की ज़्यादातर क्षमता को नौसेना कार्य बलों में व्याप्त गतिशीलता, पहुँच और धैर्य के साथ-साथ मालवाहक जहाज़ों की क्षमता से प्राप्त किया जाता है। उदाहरण के लिए, प्राकृतिक आपदा के तुरंत बाद, सबसे बड़ी चुनौती होती है भोजन, पानी और राहत सामग्री का वितरण। इन परिस्थितियों के तहत सैन्य गतिशीलता के साथ-साथ भरोसेमंद संचार ही सबसे दूर स्थित प्रभावित क्षेत्रों तक वितरण करने में सबसे असरदार साबित होता है। हालाँकि विशेषीकृत नागरिक एजेंसियां बाद की अवस्था में स्थिति को अपने नियंत्रण में ले सकती हैं, समुद्री बल सबसे पहले सहायता प्रदान कर सकते हैं और उनके प्रयासों में सहायता के लिए तैनात किए जा सकते हैं। एसएआर के लिए आईसीजी नामित राष्ट्रीय एजेंसी है। नौसेना की इकाइयों को आवश्यकता पड़ने पर एसएआर कार्यों को पूरा करने के लिए बुलाया भी जा सकता है।

  • नागरिक रक्षा और सुरक्षा का संवर्धन
  • राष्ट्रीय नम्र शक्ति का प्रदर्शन
  • एचएडीआर
  • नागरिक अधिकारीयों की सहायता
  • जल विज्ञान
  • एसएआर
  • राहत सामग्रियों व आपूर्ति का प्रावधान
  • चिकित्सा सहायता
  • गोताखोरी सहायता
  • जल विज्ञान सहायता, आदि